भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, आज मेरे देश का किसान
भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया, आज मेरे देश का किसान
दो कौड़ी के लोगों के आगे, लाचार खड़ा है पालनहार
पहले मार मौसम की खाई, फिर जैसे तैसे खड़ा हुआ
अब साहूकार का सूद चुकाकर, बेचैनी में पड़ा हुआ
बेचैनी इस बात की है कि बीज, दवा कहां से लाऊं।
जो बैंक से कर्ज लिया तो फिर पैसा कैसे लौटाऊं।
भूमि बंजर रह जाए तो फिर इस दुनिया का क्या होगा।
अपनी इस मजबूरी को किसे,कैसे बदलाऊं ।
बीवी बोली यह लो गहने साहूकार को गिरवी रख दो।
बीज, दवा, पानी से खेत सीचकर हरे-भरे कर दो।
फसल काट कर फिर मेरे गहने छुड़वा देना।
जो बचे कुछ रूपया तो, मां का चश्मा बनवा देना।
सुनकर बीवी की बातें, दिल किसान का पसीज गया।
हारकर सारी उम्मीदें भी, पालनहार फिर जीत गया।
उम्मीद करता है तुमसे मेरे देश का पालनहार।
कद्र करो अन्न जल की, ना व्यर्थ करो एक दाना भी यार।
~○● जीवन चंद्रा○●~
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