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राखी पर्व विशेष: भाई बहन की प्रेम को समर्पित

~~○भाई बहन के रिश्ते को समर्पित मेरी यह कविता○~~ है दिन आज राखी के महापर्व-त्यौहार का । यह पर्व नहीं महाउत्सव है भाई-बहन के प्यार का ।। तुम आज ना मांगो मुझसे कोई रक्षा का वचन । तुम्हारी हर खुशी के लिए समर्पित है मेरा तन मन ।। लेकिन तुम कोई अबला नारी नहीं इस युग में । तुमसे ही तो क्रांति के दीप जले हर इक युग में ।। जो आज मैं तुमको ताउम्र रक्षा का वचन दे जाऊंगा । यकीनन सदा के लिए खुद पर निर्भर बनाऊंगा ।। मुझ पर निर्भर तुम क्या अपना व्यक्तित्व बनाओगी । कैसे इस विशाल भारत देश का नेतृत्व कर पाओगी?? भूल अपनी मौलिक ताकत तुम कठपुतली सी रह जाओगी। जरा बतलाओ मुझे तुम कैसे फिर काम देश के आओगी?? जीवन जो राष्ट्र के काम ना आए वह जीवन जीना क्या व्यर्थ नहीं? आत्मरक्षा और स्वाभिमान से बेहतर जीने की कोई शर्त नहीं ।। तुम नहीं कोई कटी पतंग सी जो तुमको उड़ने का अधिकार नहीं । जब बेटा-बेटी एक समान तो क्यों बेटों जैसा तुम्हें प्यार नहीं?? जीवन राखी के महापर्व की पावन बेला पर तुमको बतलाता है l अपनी प्यारी बहिन की खातिर सदा गीत वो मंगल गाता है ll ~○●जीवन चंद्र○●~

संस्मरण: मेरठ शहर की यादें

पहाड़ में कोई धार्मिक कार्यक्रम था। मम्मी और मामा  दोनों पहाड़ गए थे। क्योंकि मेरा स्कूल था तो मुझे मेरठ ही रुकना  पड़ा। पेट दर्द का वही बहाना बनाकर जिसका इलाज आज तक किसी डॉक्टर को नहीं मिला, मैंने भी स्कूल से छुट्टी ले ली। पिताजी ऑफिस चले गए और भैया स्कूल। उन दिनों हमारे मोहल्ले में साइकिल सीखने का बहुत क्रेज था। मेरे हमउम्र अभी नई नई साइकिल खरीद रहे थे। मैंने भी सोचा नीचे रखी मामाजी की 24 इंची साइकिल से आज सारा दिन प्रैक्टिस करूंगा। नाश्ता करने के बाद घर की चाबी पड़ोस वाले घर में रखकर मैं साइकिल चलाने लगा। आज मुझे कोई  रोकने टोकने वाला नहीं था। हाँ, मम्मी घर पर होती तो कभी भी इतनी बड़ी साइकिल चलाने की इजाजत नहीं देती। घर की गैलरी से ही साइकिल पर सवार मैं अनिल हेयर ड्रेसर से होते हुए सीधे जे-ब्लॉक की ओर निकला गय। काफी अच्छा लग रहा था कि आज मैं गद्दी पर बैठकर इतनी ऊंची साइकिल चला रहा हूं। पांच-छह चक्कर लगाने के बाद दिनेश इलेक्ट्रॉनिक्स के सामने अचानक मेरी साईकिल अनियंत्रित हो गई और मैं गिर पड़ा। पीछे से आ रही मेरी क्लास में पढ़ने वाली मोनिका की दीदी अर्चना ने मुझे उठाते...