संस्मरण: मेरठ शहर की यादें


पहाड़ में कोई धार्मिक कार्यक्रम था। मम्मी और मामा  दोनों पहाड़ गए थे। क्योंकि मेरा स्कूल था तो मुझे मेरठ ही रुकना  पड़ा। पेट दर्द का वही बहाना बनाकर जिसका इलाज आज तक किसी डॉक्टर को नहीं मिला, मैंने भी स्कूल से छुट्टी ले ली। पिताजी ऑफिस चले गए और भैया स्कूल। उन दिनों हमारे मोहल्ले में साइकिल सीखने का बहुत क्रेज था। मेरे हमउम्र अभी नई नई साइकिल खरीद रहे थे। मैंने भी सोचा नीचे रखी मामाजी की 24 इंची साइकिल से आज सारा दिन प्रैक्टिस करूंगा। नाश्ता करने के बाद घर की चाबी पड़ोस वाले घर में रखकर मैं साइकिल चलाने लगा। आज मुझे कोई  रोकने टोकने वाला नहीं था। हाँ, मम्मी घर पर होती तो कभी भी इतनी बड़ी साइकिल चलाने की इजाजत नहीं देती। घर की गैलरी से ही साइकिल पर सवार मैं अनिल हेयर ड्रेसर से होते हुए सीधे जे-ब्लॉक की ओर निकला गय। काफी अच्छा लग रहा था कि आज मैं गद्दी पर बैठकर इतनी ऊंची साइकिल चला रहा हूं। पांच-छह चक्कर लगाने के बाद दिनेश इलेक्ट्रॉनिक्स के सामने अचानक मेरी साईकिल अनियंत्रित हो गई और मैं गिर पड़ा। पीछे से आ रही मेरी क्लास में पढ़ने वाली मोनिका की दीदी अर्चना ने मुझे उठाते हुए कहा "और दिखा ले स्टंटबाजी, इससे बड़ी साइकिल नहीं मिली तुझे चलाने को" साइकिल इतनी जोर से गिरेगी मैंने सोचा नहीं था। मेरे दाहिने हाथ की कोहनी में काफी दर्द हो रहा था। लेकिन अर्चना को इसका एहसास कराए बिना में साइकिल को  घसीटते हुए अपने मोहल्ले में आ गया। जैसे ही मोहल्ले में पहुंचा तो मुझे संतोष आंटी की नज़रों का सामना करना पड़ा। उन्हें पता था कि मम्मी पहाड़ गई है, उन्होंने पूछा "क्या हुआ साइकिल से गया क्या??" मैं हां में सिर हिलाते हुए नाले की पटरी पर बैठ गया। उन्होंने मेरा हाथ देखा फिर बोली चिंता मत कर ठीक हो जाएगा, घर जाकर सो जा। मुझे काफी तेज दर्द हो रहा था लेकिन उस बीच मेरे पास कोई नहीं था। मैं कपड़े से अपना हाथ बांधकर लेट गया। करीब 3:00 बजे भैया आए और उन्होंने पूछा हाथ कैसे बांध रखा है। मैंने बताया साइकिल से गिर गया। भैया बोले साइकिल तो सीख गया होगा ना?? चल अगले साल तेरा एडमिशन भी एन.ए.एस इंटर कॉलेज में करा देंगे। उन्होंने कपड़ा हटाकर देखा तो हाथ मैं काफी सूजन थी। इतनी ही देर में नीचे से संतोष आंटी की आवाज आई।
जीवन,कमल !
भैया आवाज सुनकर बाहर पहुंचे तो आंटी ने पूछा "अभी कैसा है जीवन का हाथ"
मैंने ऊपर से हाथ ऐसे दिखाया जैसे कोई क्रिकेटर मैन ऑफ द मैच की ट्रॉफी दिखाता है। सूजन देख आंटी दौड़ी-दौड़ी ऊपर आयी। उन्होंने 38 नंबर में रहने वाले हिम्मत सिंह अंकल का दरवाजा खटखटाया। बताया कि जीवन साइकिल से गिर गया है शायद हड्डी फ्रैक्चर है। अभी तक तो सब ठीक था लेकिन फैक्चर की बात सुनते ही मेरी आंखों में आंसू आ गए। मुझे डर सताने लगा था कि थोड़ी ही देर में पापा आएंगे तो क्या कहेंगे। मम्मी को पता चलेगा तो वह भी गुस्सा करेंगी। पता नहीं कितने दिन स्कूल नहीं जा पाऊंगा। खैर, हिम्मत सिंह अंकल ने अपनी लूना टाइप स्कूटी निकालकर मुझे पीछे बैठा लिया। साकेत के पास पहुंचते ही हमने पापा को आते देखा। अंकल ने उन्हें आवाज लगाई। मुझे  स्कूटी में पीछे बैठा देखकर पापा चौक गए। फिर  पापा को बताया गया कि मैं साइकिल से गिर गया था। पापा ने भी स्कूटी के पीछे-पीछे साइकिल लगा दी। थोड़ी देर बाद एक टेलीफोन बूथ पर रुक गए। बेगमपुल पहुंचने पर पापा ने आपके बाजार स्थित डॉ लोकेश मराठा के यहां ट्रीटमेंट कराने की बात कही। डॉ लोकेश मुस्कुराते हुए बोले "सीख गए बेटा साइकिल"। यह सुनकर मुझे और रोना आ गया और सोच भी रहा था कि इन्हें कैसे पता चला। एक्स-रे किया गया तो पता चला कि फैक्चर है। 30 दिन के लिए प्लास्टर कर दिया गया। डॉ मराठा ने प्लास्टर ड्रेसिंग के अलावा ना तो दवाइयों के रुपए लिए और नहीं एक्स-रे के। यह सब मेरे लिए चौंकाने वाला था। बाद में पता चला कि पापा के ऑफिस से डॉ पुष्पा सहगल की डॉक्टर मराठा से बात हुई थी। वापसी में मैं यही सोच रहा था कि घर पर कितनी डांट पड़ेगी। लेकिन ऐसा कुछ हुआ नहीं। घर पहुंचते ही पापा ने एक गिलास दूध के साथ कुछ कैल्शियम की गोली थी। और 1 महीने लगातार इन्हें खाने की सख्त हिदायत दी। एक-दो दिन में मम्मी भी पहाड़ से वापस आ गई और सब कुछ सामान्य हो गया। लेकिन मैं अभी भी स्कूल नहीं जा पा रहा था। कारण मेरा प्लास्टर और मेरा शरारती स्वभाव था। ऐसे में घरवाले कोई भी रिस्क नहीं लेना चाह रहे थे। मेरी बचपन की फ्रेंड और क्लासमेट REENA BISHT को पता चला कि मुझे चोट लग गई तो वो घर पर आई। उसने बोला तू होमवर्क और क्लास वर्क की टेंशन ना लें। मैं स्कूल से आकर रोज शाम को तेरा काम कर दिया करूंगी। मैंने उसे बताया काम तो मैं भी कर लूंगा क्योंकि मैं लेफ्ट-हैंडी हूं। फिर हर रोज शाम को रीना घर पर आती या मैं उसके घर चले जाया करता। और इस तरह मेरा स्कूल का सारा काम हो जाता। इसी बीच वो स्कूल की बातें बताती।  कि जोशी सर ने किसकी पिटाई की, बेबी मैडम ने किसे डांटा, कौन किसके बैग से चोरी करता हुआ पकड़ा गया। अब से पहले तक रीना मुझे एक नकचढ़ी, अकड़ू और बेवकूफ लड़की लगती थी। लेकिन आज उसके इस व्यवहार ने मेरे दिमाग से उसकी उन तमाम छवियों को मिटा दिया था, जिसके कारण मैं उसके बारे में यह सब सोचता था। पांचवी क्लास के पेपर हुए और में ठीक-ठाक नंबरों से पास हो गया। अगले साल मैंने एन.ए.एस इंटर कॉलेज में एडमिशन ले लिया और रीना ने आर.जी.इंटर कॉलेज में। क्योंकि हम दोनों का घर ज्यादा दूर नहीं था तो छठवीं और सातवीं क्लास में हम दोनों अपने-अपने स्कूल में होने वाली पढ़ाई का तुलनात्मक अध्ययन करते। आठवीं में आने से पहले ही हम उत्तराखंड शिफ्ट हो गए। वहां से आने के बाद मैं इतना उदास हो गया था कि कभी किसी से कोई संपर्क करने की कोशिश नहीं की। लेकिन धीरे-धीरे Facebook के माध्यम से कई लोग मिलते गए। करीब 5 साल पहले एक लड़की का फोन आता है। पूछती है "जीवन बात कर रहे हो" मैंने कहा हां आप कौन ??बड़े ही गुस्सैल अंदाज में आवाज आती है "हां अब क्यों याद रखोगे कि मैं कौन ! अब तो चले गए ना तो मेरठ छोड़कर। तुम्हारे चाचा से नंबर लिया था। सोचा आवाज पहचान जाओगे, बात करोगे। लेकिन जाने दो"। अब तक मैं समझ चुका था कि यह और कोई नहीं मेरे अजीज दोस्त रीना ही है। फिर हमने घंटे भर से ज्यादा बात की और एक दूसरे के घर परिवार का हाल जाना। अच्छा लगता है जब कोई तुम्हारा अपना बचपन का दोस्त लंबे समय बाद मिलता है। इस खुशी को मापना उतना ही मुश्किल होता है जितना इसका एहसास करना। बीते 14 सालों में न जाने उस शहर को मैंने कितनी बार कल्पनाओं में जिया होगा। होली, दीपावली, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गणेश महोत्सव और रामलीला जैसे तमाम धार्मिक उत्सवों की छवि आज भी मेरे ज़हन में वैसे ही है जैसी मेरठ शहर ने मुझे दी थी। हर उत्सव में बड़ों का मार्गदर्शन और मिलने वाली आर्थिक सहायता आज न जाने कहां गुम हो गई है।

मिस यू मेरठ शहर

~○•जीवन चंद्र•○~

Comments

  1. Bot khoob bhai...ik. sec... ke liye v njr ni hti meri....

    Bot khoob... bemisaal lekh..

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